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VOL. 1, ISSUE 1 (2025)
हिन्दी नाटक में युवा पात्रों की भूमिका
Authors
ज्ञानी देवी गुप्ता
Abstract
हिन्दी नाटक परम्परा एवं आधुनिकता के मध्य चलने वाले संघर्ष, सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक विकास की जटिलताओं को अभिव्यक्त करता है। इस नाट्य परंपरा में युवा पात्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। युवा केवल कथानक को आगे बढ़ाने वाले चरित्र नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, उथल-पुथल, विद्रोह, बदलाव और नयी संभावनाओं के प्रतीक के रूप में उभरते हैं। हिन्दी नाटकों में युवा पात्र समाज के भीतर उठते प्रश्नोंकृजैसे शिक्षा, बेरोजगारी, प्रेम, स्वतंत्रता, नैतिकता, पारिवारिक संघर्ष, पहचान और सामाजिक दायित्वकृको नाटकीय रूप में प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक नाटककारों, विशेषकर मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर, धर्मवीर भारती, विशाल सक्सेना और बाद के नाटककारों ने युवाओं को अपने नाटकीय ढाँचों के केन्द्र में रखा है। इन युवा पात्रों में तीव्र भावनाएँ, आदर्शवाद, जीवन-संघर्ष, असंतोष और सामाजिक बदलाव की आकांक्षा दिखाई देती है। वे अक्सर सत्ता, परम्परा और रूढ़ियों से टकराते हैं तथा नए मूल्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं। इसी कारण, हिन्दी नाटक में युवा पात्र समाज की बदलती मानसिकता, संस्कृति और राजनीति के प्रतिबिंब बन जाते हैं। यह अध्ययन इस बात को रेखांकित करता है कि युवा पात्र न केवल नाटक की कथा-संरचना, प्रतीक-व्यवस्था और नाटकीय तनाव को आकार देते हैं, बल्कि हिन्दी नाटक को सामाजिक संवेदना और परिवर्तनशीलता के एक महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में भी स्थापित करते हैं।
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Pages:10-14
How to cite this article:
ज्ञानी देवी गुप्ता "हिन्दी नाटक में युवा पात्रों की भूमिका". World Journal of Hindi, Vol 1, Issue 1, 2025, Pages 10-14
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